दीक्षा

सत्यं वद धर्मं चर स्वाध्यायान्मा प्रमदः ।

आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः ।।

वेदांचे शिक्षण पूर्ण झाल्यानंतर

आश्रमातील शिष्यांना अनुशासनाची दीक्षा देताना आचार्य सांगतात : ” नेहमी सत्य बोला , धर्मसंमत आचरण करा . स्वाध्यायाबद्दल कुचराई करु नका . आचार्यांना अपेक्षित गुरुदक्षिणा (भिक्षा मागून) आणून दिल्यानंतर गृहस्थाश्रमात प्रवेश करुन प्रजोत्पादन परंपरेचा व्यवच्छेद करु नका .”

वेदों के शिक्षण के पश्चात् आचार्य आश्रमस्थ शिष्यों को अनुशासन सिखाते है : ” हमेशा सत्य बोलो । धर्मसम्मत आचरण करो । स्वाध्याय के प्रति प्रमाद मत करो । आचार्य को जो अभीष्ट हो वह धन (भिक्षा मांगकर) लाकर देने के बाद गृहस्थाश्रम में प्रवेश कर संतान-परंपरा का व्यवच्छेद मत करो । ”

This subhashita contains advice to the bachelor student graduating from a Gurukul and before entering the stage of the householder ( Grihasthashrama ) : Always speak truth , behave as dharma indictates and do not miss self-study ( svadhyaya ) . Pay expected fees to the teacher ( gurudakshina ) , do not interrupt family propagation .

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