शूद्रः. (4) – शूद्र (पुं), अवरवर्ण (पुं), वृषल (पुं), जघन्यज (पुं)
2.10.1.1 – शूद्राश्चावरवर्णाश्च वृषलाश्च जघन्यजाः

सङ्करवर्णः. (1) – अम्बष्ठकरण (पुं)
2.10.1.2 – आचण्डालात्तु सङ्कीर्णा अम्बष्ठकरणादयः

वैश्याच्छूद्रायां जातः. (1) – करण (पुं)
वैश्यात्ब्राह्मणीभ्यामुत्पन्नः. (1) – अम्बष्ठ (पुं)
2.10.2.1 – शूद्राविशोस्तु करणोऽम्बष्ठो वैश्याद्विजन्मनोः

शूद्राक्षत्रियाभ्यामुत्पन्नः. (1) – उग्र (पुं)
क्षत्रियाद्वैश्याभ्यामुत्पन्नः. (1) – मागध (पुं)
2.10.2.2 – शूद्राक्षत्रिययोरुग्रो मागधः क्षत्रियाविशोः

वैश्याक्षत्रियाभ्यामुत्पन्नः. (1) – माहिष (पुं)
आर्यशूद्राभ्यामुत्पन्नः. (1) – क्षन्त्रृ (पुं)
2.10.3.1 – माहिष्योऽर्याक्षत्रिययोः क्षत्तार्याशूद्रयोः सुतः

क्षत्रियाद्ब्राह्मण्यामुत्पन्नः. (1) – सूत (पुं)
वैश्यात् ब्राह्मण्यामुत्पन्नः. (1) – वैदेहक (पुं)
2.10.3.2 – ब्राह्मण्यां क्षत्रियात्सूतस्तस्यां वैदेहको विशः

करण्यां माहिष्यादुत्पन्नः. (1) – रथकार (पुं)
2.10.4.1 – रथकारस्तु माहिष्यात्करण्यां यस्य संभवः

ब्राह्मण्यां वृषलेन जनितः. (1) – चण्डाल (पुं)
2.10.4.2 – स्याच्चण्डालस्तु जनितो ब्राह्मण्यां वृषलेन यः

चित्रकारादिः. (2) – कारु (पुं), शिल्पिन् (पुं)
सजातीयशिल्पिसङ्घः. (1) – श्रेणि (स्त्री-पुं)
2.10.5.1 – कारुः शिल्पी संहतैस्तैर्द्वयोः श्रेणिः सजातिभिः

कारुसङ्घे मुख्यः. (2) – कुलक (पुं), कुलश्रेष्ठिन् (पुं)
मालाकारः. (2) – मालाकार (पुं), मालिक (पुं)
2.10.5.2 – कुलकः स्यात्कुलश्रेष्ठी मालाकारस्तु मालिकः

कुम्भकारः. (2) – कुम्भकार (पुं), कुलाल (पुं)
गृहादौ लेपकारः. (2) – पलगण्ड (पुं), लेपक (पुं)
2.10.6.1 – कुम्भकारः कुलालः स्यात्पलगण्डस्तु लेपकः

पटनिर्माता. (2) – तन्तुवाय (पुं), कुविन्द (पुं)
कञ्चुक्यादेर्निर्माता. (2) – तुन्नवाय (पुं), सौचिक (पुं)
2.10.6.2 – तन्तुवायः कुविन्दः स्यात्तुन्नवायस्तु सौचिकः

चित्रकारः. (2) – रङ्गाजीव (पुं), चित्रकर (पुं)
शस्त्रघर्षणोपजीविः. (2) – शस्त्रमार्ज (पुं), असिधावक (पुं)
2.10.7.1 – रङ्गाजीवश्चित्रकरः शस्त्रमार्जोऽसि धावकः

चर्मकारः. (2) – पादकृत् (पुं), चर्मकार (पुं)
लोहकारकः. (2) – व्योकार (पुं), लोहकारक (पुं)
2.10.7.2 – पादकृच्चर्मकारः स्याद्व्योकारो लोहकारकः

स्वर्णकारः. (4) – नाडिन्धम (पुं), स्वर्णकार (पुं), कलाद (पुं), रुक्मकारक (पुं)
2.10.8.1 – नाडिन्धमः स्वर्णकारः कलादो रुक्मकारकः

शङ्खवादकः. (2) – शाङ्खिक (पुं), काम्बविक (पुं)
ताम्रकारः. (2) – शौल्बिक (पुं), ताम्रकुट्टक (पुं)
2.10.8.2 – स्याच्छाङ्खिकः काम्बविकः शौल्बिकस्ताम्रकुट्टकः

तक्षः. (5) – तक्षन् (पुं), वर्धकि (पुं), त्वष्टृ (पुं), रथकार (पुं), काष्ठतक्ष (पुं)
2.10.9.1 – तक्षा तु वर्धकिस्त्वष्टा रथकारस्तु काष्ठतट्

ग्रामतक्षः. (2) – ग्रामाधीन (पुं), ग्रामतक्ष (पुं)
कौटतक्षः. (1) – कौटतक्ष (पुं)
2.10.9.2 – ग्रामाधीनो ग्रामतक्षः कौटतक्षोऽनधीनकः

क्षुरिः. (5) – क्षुरिन् (पुं), मुण्डिन् (पुं), दिवाकीर्ति (पुं), नापित (पुं), अन्तावसायिन् (पुं)
2.10.10.1 – क्षुरी मुण्डी दिवाकीर्तिनापितान्तावसायिनः

रजकः. (2) – निर्णेजक (पुं), रजक (पुं)
शौण्डिकः. (2) – शौण्डिक (पुं), मण्डहारक (पुं)
2.10.10.2 – निर्णेजकः स्याद्रजकः शौण्डिको मण्डहारकः

अजाजीवनः. (2) – जाबाल (पुं), अजाजीव (पुं)
देवपूजोपजीविनः. (2) – देवाजीव (पुं), देवल (पुं)
2.10.11.1 – जाबालः स्यादजाजीवो देवाजीवस्तु देवलः

इन्द्रजालादिमाया. (2) – माया (स्त्री), शाम्बरी (स्त्री)
इन्द्रजालिकः. (2) – मायाकार (पुं), प्रतिहारक (पुं)
2.10.11.2 – स्यान्माया शाम्बरी मायाकारस्तु प्रतिहारकः

नटः. (4) – शैलालिन् (पुं), शैलूष (पुं), जायाजीव (पुं), कृशाश्विन् (पुं)
2.10.12.1 – शैलालिनस्तु शैलूषा जायाजीवाः कृशाश्विनः

नटः. (2) – भरत (पुं), नट (पुं)
काथिकः. (2) – चारण (पुं), कुशीलव (पुं)
2.10.12.2 – भरता इत्यपि नटाश्चारणास्तु कुशीलवाः

मृदङ्गवादकः. (2) – मार्दङ्गिक (पुं), मौरजिक (पुं)
करतालिकावादकः. (2) – पाणिवाद (पुं), पाणिघ (पुं)
2.10.13.1 – मार्दङ्गिका मौरजिकाः पाणिवादास्तु पाणिघाः

वेणुवादकः. (2) – वेणुध्म (पुं), वैणविक (पुं)
वीणावादकः. (2) – वीणावाद (पुं), वैणिक (पुं)
2.10.13.2 – वेणुध्माः स्युर्वैणविका वीणावादास्तु वैणिकाः

पक्षीणां हन्ता. (2) – जीवान्तक (पुं), शाकुनिक (पुं)
जालेन मृगान्बध्नः. (2) – वागुरिक (पुं), जालिक (पुं)
2.10.14.1 – जीवान्तकः शाकुनिको द्वौ वागुरिकजालिकौ

मांसविक्रयजीविः. (3) – वैतंसिक (पुं), कौटिक (पुं), मांसिक (पुं)
2.10.14.2 – वैतंसिकः कौटिकश्च मांसिकश्च समं त्रयम्

वेतनोपजीविः. (4) – भृतक (पुं), भृतिभुज् (पुं), कर्मकर (पुं), वैतनिक (पुं)
2.10.15.1 – भृतको भृतिभुक्कर्मकरो वैतनिकोऽपि सः

वार्तावाहकः. (2) – वार्तावह (पुं), वैवधिक (पुं)
भारवाहकः. (2) – भारवाह (पुं), भारिक (पुं)
2.10.15.2 – वार्तावहो वैवधिको भारवाहस्तु भारिकः

नीचः. (5) – विवर्ण (पुं), पामर (पुं), नीच (पुं), प्राकृत (पुं), पृथग्जन (पुं)
2.10.16.1 – विवर्णः पामरो नीचः प्राकृतश्च पृथग्जनः

नीचः. (5) – निहीन (पुं), अपसद (पुं), जाल्म (पुं), क्षुल्लक (पुं), चेतर (पुं)
2.10.16.2 – निहीनोऽपसदो जाल्मः क्षुल्लकश्चेतरश्च सः

दासः. (6) – भृत्य (पुं), दासेर (पुं), दासेय (पुं), दास (पुं), गोप्यक (पुं), चेटक (पुं)
2.10.17.1 – भृत्ये दासेरदासेयदासगोप्यकचेटकाः

दासः. (5) – नियोज्य (पुं), किङ्कर (पुं), प्रैष्य (पुं), भुजिष्य (पुं), परिचारक (पुं)
2.10.17.2 – नियोज्यकिङ्करप्रैष्यभुजिष्यपरिचारकाः

परेण संवर्धितः. (4) – पराचित (पुं), परिस्कन्द (पुं), परजात (पुं), परैधित (पुं)
2.10.18.1 – पराचितपरिस्कन्दपरजातपरैधिताः

अलसः. (6) – मन्द (पुं), तुन्दपरिमृज (पुं), आलस्य (पुं), शीतक (पुं), अलस (पुं), अनुष्ण (पुं)
2.10.18.2 – मान्दस्तुन्दपरिमृज आलस्यः शीतकोऽलसोऽनुष्णः

चतुरः. (6) – दक्ष (पुं), चतुर (पुं), पेशल (पुं), पटु (पुं), सूत्थान (पुं), उष्ण (पुं)
2.10.19.1 – दक्षे तु चतुरपेशलपटवः सूत्थान उष्णश्च

चण्डालः. (5) – चण्डाल (पुं), प्लव (पुं), मातङ्ग (पुं), दिवाकीर्ति (पुं), जनङ्गम (पुं)
2.10.19.2 – चण्डालप्लवमातङ्गदिवाकीर्तिजनङ्गमाः

चण्डालः. (5) – निषाद (पुं), श्वपच (पुं), अन्तेवासिन् (पुं), चाण्डाल (पुं), पुक्कस (पुं)
2.10.20.1 – निषादश्वपचावन्तेवासिचाण्डालपुक्कसाः

किरातः. (1) – किरात (पुं)
शबरः. (1) – शबर (पुं)
पुलिन्दः. (1) – पुलिन्द (पुं)
2.10.20.2 – भेदाः किरातशबरपुलिन्दा म्लेच्छजातयः

मृगवधाजीवः. (4) – व्याध (पुं), मृगवधाजीव (पुं), मृगयु (पुं), लुब्धक (पुं)
2.10.21.1 – व्याधो मृगवधाजीवो मृगयुर्लुब्धकोऽपि सः

शुनकः. (4) – कौलेयक (पुं), सारमेय (पुं), कुक्कुर (पुं), मृगदंशक (पुं)
2.10.21.2 – कौलेयकः सारमेयः कुक्कुरो मृगदंशकः

शुनकः. (3) – शुनक (पुं), भषक (पुं), श्वान (पुं)
मत्तशुनः. (2) – अलर्क (पुं), योगित (पुं)
2.10.22.1 – शुनको भषकः श्वा स्यादलर्कस्तु स योगितः

मृगयाकुशलशुनः. (1) – विश्वकद्रु (पुं)
शुनी. (2) – सरमा (स्त्री), शुनी (स्त्री)
2.10.22.2 – श्वा विश्वकद्रुर्मृगयाकुशलः सरमा शुनी

ग्राम्यसूकरः. (1) – विट्चर (पुं)
तरुणपशुः. (1) – वर्कर (पुं)
2.10.23.1 – विट्चरः सूकरो ग्राम्यो वर्करस्तरुणः पशुः

मृगया. (4) – आच्छोदन (नपुं), मृगव्य (नपुं), आखेट (पुं), मृगया (स्त्री)
2.10.23.2 – आच्छोदनं मृगव्यं स्यादाखेटोमृगया स्त्रियाम्

दक्षिणव्रणकुरङ्गः. (1) – दक्षिणेर्मन् (पुं)
2.10.24.1 – दक्षिणारुर्लुब्धयोगाद्दक्षिणेर्मा कुरङ्गकः

चोरः. (6) – चौर (पुं), एकागारिक (पुं), स्तेन (पुं), दस्यु (पुं), तस्कर (पुं), मोषक (पुं)
2.10.24.2 – चौरैकागारिकस्तेनदस्युतस्करमोषकाः

चोरः. (4) – प्रतिरोधिन् (पुं), परास्कन्दिन् (पुं), पाटच्चर (पुं), मलिम्लुच (पुं)
2.10.25.1 – प्रतिरोधिपरास्कन्दिपाटच्चरमलिम्लुचाः

चोरकर्मः. (4) – चौरिका (स्त्री), स्तैन्य (नपुं), चौर्य (नपुं), स्तेय (नपुं)
चौर्यधनम्. (1) – लोप्त्र (नपुं)
2.10.25.2 – चौरिका स्तैन्यचोर्ये च स्तेयं लोप्त्रं तु तद्धने

मृगादिबन्धनसाधनम्. (1) – वीतंस (पुं)
2.10.26.1 – वीतंसस्तूपकरणं बन्धने मृगपक्षिणाम्

मृगादिबन्धनयन्त्रम्. (2) – उन्माथ (पुं), कूटयन्त्र (नपुं)
जालविशेषः. (2) – वागुरा (स्त्री), मृगबन्धनी (स्त्री)
2.10.26.2 – उन्माथः कूटयन्त्रं स्याद्वागुरा मृगबन्धनी

रज्जुः. (5) – शुल्ब (नपुं), वराटक (पुं), रज्जु (स्त्री), वटी (वि), गुण (पुं)
2.10.27.1 – शुल्बं वराटकं स्त्री तु रज्जुस्त्रिषु वटी गुणः

सलिलोद्वाहनयन्त्रम्. (2) – उद्घाटन (नपुं), घटीयन्त्र (नपुं)
2.10.27.2 – उद्घाटनं घटीयन्त्रं सलिलोद्वाहनं प्रहेः

वस्त्रव्यूतिदण्डः. (2) – वेमन् (पुं-नपुं), वायदण्ड (पुं)
तन्तवः. (2) – सूत्र (नपुं), तन्तु (पुं)
2.10.28.1 – पुंसि वेमा वायदण्डः सूत्राणि नरि तन्तवः

तन्तुवानः. (2) – वाणि (स्त्री), व्यूति (स्त्री)
वस्त्रादिलेप्यम्. (1) – पुस्त (नपुं)
2.10.28.2 – वाणिर्व्यूतिः स्त्रियौ तुल्ये पुस्तं लेप्यादिकर्मणि

वस्त्रदन्तादिभिः कृतपुत्रिका. (2) – पाञ्चालिका (स्त्री), पुत्रिका (स्त्री)
2.10.29.1 – पाञ्चालिका पुत्रिका स्याद्वस्त्रदन्तादिभिः कृता

जतुविकारः. (1) – जातुष (वि)
त्रपुविकारः. (1) – त्रापुष (वि)
2.10.29.2 – जतुत्रपुविकारे तु जातुषं त्रापुषं त्रिषु

पेटकः. (4) – पिटक (पुं), पेटक (पुं), पेटा (स्त्री), मञ्जूषा (स्त्री)
शक्याधारलगुडः. (1) – विहङ्गिका (स्त्री)
2.10.29.3 – पिटकः पेटकः पेटा मञ्जूषाथ विहङ्गिका

शक्याधारलगुडः. (1) – भारयष्टि (स्त्री)
भारयष्ट्यामालम्बमानः. (2) – शिक्य (नपुं), काच (पुं)
पादुका. (1) – पादुका (स्त्री)
2.10.30.1 – भारयष्टिस्तदालम्बि शिक्यं काचोऽथ पादुका

पादुका. (2) – पादू (स्त्री), उपानह् (स्त्री)
विस्तृतपादुका. (1) – अनुपदीना (स्त्री)
2.10.30.2 – पादूरुपानत्स्त्री सैवानुपदीना पदायता

चर्ममयरज्जुः. (3) – नध्री (स्त्री), वर्ध्री (स्त्री), वरत्रा (स्त्री)
अश्वादेस्ताडनी. (1) – कशा (स्त्री)
2.10.31.1 – नध्री वध्री वरत्रा स्यादश्वादेस्ताडनी कशा

चाण्डालिका. (3) – चाण्डालिका (स्त्री), कण्डोलवीणा (स्त्री), चण्डालवल्लकी (स्त्री)
2.10.31.2 – चाण्डालिका तु कण्डोलवीणा चण्डालवल्लकी

सुवर्णतुला. (2) – नाराची (स्त्री), एषणिका (स्त्री)
स्वर्णघर्षणशिला. (3) – शाण (पुं), निकष (पुं), कष (पुं)
2.10.32.1 – नाराची स्यादेषणिका शाणस्तु निकषः कषः

सुवर्णादिच्छेदनद्रव्यम्. (2) – व्रश्चन (पुं), पत्रपरशु (पुं)
शलाकाभेदः. (2) – एषिका (स्त्री), तूलिका (स्त्री)
2.10.32.2 – व्रश्चनःपत्रपरशुरीषिका तूलिका समे

मूषा. (2) – तैजसावर्तनी (स्त्री), मूषा (स्त्री)
अग्निज्वलनवस्तु. (2) – भस्त्रा (स्त्री), चर्मप्रसेविका (स्त्री)
2.10.33.1 – तैजसावर्तनी मूषा भस्त्रा चर्मप्रसेविका

मुक्तादिवेधिनी. (2) – आस्फोटनी (स्त्री), वेधनिका (स्त्री)
कर्तरी. (2) – कृपाणी (स्त्री), कर्तरी (स्त्री)
2.10.33.2 – आस्फोटनी वेधनिका कृपाणी कर्तरी समे

वृक्षभेदनायुधम्. (2) – वृक्षादनी (स्त्री), वृक्षभेदिन् (पुं)
पाषाणदारणघनभेदः. (2) – टङ्क (पुं), पाषाणदारण (पुं)
2.10.34.1 – वृक्षादनी वृक्षभेदी टङ्कः पाषाणदारणः

शास्त्रादिविदारणशस्त्रम्. (2) – क्रकच (पुं-नपुं), करपत्र (नपुं)
चर्मखण्डनशस्त्रम्. (2) – आरा (स्त्री), चर्मप्रभेधिका (स्त्री)
2.10.34.2 – क्रकचोऽस्त्री करपत्रमारा चर्मप्रभेदिका

लोहप्रतिमा. (3) – सूर्मी (स्त्री), स्थूणा (स्त्री), अयःप्रतिमा (स्त्री)
कलाकौशल्यादिकर्मः. (1) – शिल्प (नपुं)
2.10.35.1 – सूर्मी स्थूणायःप्रतिमा शिल्पं कर्म कलादिकम्

प्रतिमा. (5) – प्रतिमान (नपुं), प्रतिबिम्ब (नपुं), प्रतिमा (स्त्री), प्रतियातना (स्त्री), प्रतिच्छाया (स्त्री)
2.10.35.2 – प्रतिमानं प्रतिबिम्बं प्रतिमा प्रतियातना प्रतिच्छाया

प्रतिमा. (3) – प्रतिकृति (स्त्री), अर्चा (स्त्री), प्रतिनिधि (पुं)
उपमा. (2) – उपमा (स्त्री), उपमान (नपुं)
2.10.36.1 – प्रतिकृतिरर्चा पुंसि प्रतिनिधिरुपमोपमानं स्यात्

सदृशः. (6) – वाच्यलिङ्ग (वि), सम (वि), तुल्य (वि), सदृक्ष (वि), सदृश (वि), सदृश् (वि)
2.10.36.2 – वाच्यलिङ्गाः समस्तुल्यः सदृक्षः सदृशः सदृक्

सदृशः. (2) – साधारण (वि), समान (वि)
2.10.37.1 – साधारणः समानश्च स्युरुत्तरपदे त्वमी

2.10.37.2 – निभसङ्काशनीकाशप्रतीकाशोपमादयः

वेतनम्. (6) – कर्मण्या (स्त्री), विधा (स्त्री), भृत्या (स्त्री), भृति (स्त्री), भर्मन् (नपुं), वेतन (नपुं)
2.10.38.1 – कर्मण्या तु विधाभृत्याभृतयो भर्म वेतनम्

वेतनम्. (5) – भरण्य (नपुं), भरण (नपुं), मूल्य (नपुं), निर्वेश (पुं), पण (पुं)
2.10.38.2 – भरण्यं भरणं मूल्यं निर्वेशः पण इत्यपि

सुरा. (5) – सुरा (स्त्री), हलिप्रिया (स्त्री), हाला (स्त्री), परिस्रुत् (स्त्री), वरुणात्मजा (स्त्री)
2.10.39.1 – सुरा हलिप्रिया हाला परिस्रुद्वरुणात्मजा

सुरा. (5) – गन्धोत्तमा (स्त्री), प्रसन्ना (स्त्री), इरा (स्त्री), कादम्बरी (स्त्री), परिस्रुत् (स्त्री)
2.10.39.2 – गन्धोत्तमाप्रसन्नेराकादम्बर्यः परिस्रुता

सुरा. (3) – मदिरा (स्त्री), कश्य (नपुं), मद्य (नपुं)
पानरुचिजनकभक्षणम्. (1) – अवदंश (पुं)
2.10.40.1 – मदिरा कश्यमद्ये चाप्यवदंशस्तु भक्षणम्

मद्यगृहम्. (3) – शुण्डा (स्त्री), पान (नपुं), मदस्थान (नपुं)
मधुपानावसरः. (2) – मधुवार (पुं), मधुक्रम (पुं)
2.10.40.2 – शुण्डापानं मदस्थानं मधुवारा मधुक्रमाः

मधुकपुष्पकृतमद्यम्. (4) – मध्वासव (पुं), माधवक (पुं), मधु (नपुं), मार्द्वीक (नपुं)
2.10.41.1 – मध्वासवो माधवको मधु माध्वीकमद्वयोः

इक्षुशाकादिजन्यमद्यम्. (3) – मैरेय (नपुं), आसव (पुं), सीधु (पुं)
सुराकल्कः. (2) – मेदक (पुं), जगल (पुं)
2.10.41.2 – मैरेयमासवः सीधुर्मेन्दको जगलः समौ

मद्यसन्धानम्. (2) – सन्धान (नपुं), अभिषव (पुं)
नानाद्रव्यकृतमद्यम्. (2) – किण्व (नपुं), नग्नहू (पुं)
2.10.42.1 – सन्धानं स्यादभिषवः किण्वं पुंसि तु नग्नहूः

सुरामण्डः. (2) – कारोत्तर (पुं), सुरामण्ड (पुं)
पानसभा. (2) – आपान (नपुं), पानगोष्ठिका (स्त्री)
2.10.42.2 – कारोत्तरः सुरामण्ड आपानं पानगोष्ठिका

मद्यपात्रम्. (2) – चषक (पुं-नपुं), पानपात्र (नपुं)
मद्यपानम्. (2) – सरक (पुं), अनुतर्षण (नपुं)
2.10.43.1 – चषकोऽस्त्री पानपात्रं सरकोऽप्यनुतर्षणम्

द्यूतकृत्. (5) – धूर्त (पुं), अक्षदेविन् (पुं), कितव (पुं), अक्षधूर्त (पुं), द्यूतकृत् (पुं)
2.10.43.2 – धूर्तोऽक्षदेवी कितवोऽक्षधूर्तो द्यूतकृत्समाः

ऋणादौ प्रतिनिधिभूतः. (2) – लग्नक (पुं), प्रतिभू (पुं)
द्यूतकारकः. (2) – सभिक (पुं), द्यूतकारक (पुं)
2.10.44.1 – स्युर्लग्नकाः प्रतिभुवः सभिका द्यूतकारकाः

द्यूतक्रीडनम्. (4) – द्यूत (पुं-नपुं), अक्षवती (स्त्री), कैतव (नपुं), पण (पुं)
2.10.44.2 – द्यूतोऽस्त्रियामक्षवती कैतवं पण इत्यपि

द्यूते लाप्यमानः. (2) – पण (पुं), ग्लह (पुं)
अक्षः. (3) – अक्ष (पुं), देवन (पुं), पाशक (पुं)
2.10.45.1 – पणोऽक्षेषु ग्लहोऽक्षास्तु देवनाः पाशकाश्च ते

शारीणामितस्ततः नयनम्. (1) – परिणाय (पुं)
2.10.45.2 – परिणायस्तु शारीणां समन्तान्नयने स्त्रियाम्

शारीणामाधारपट्टः. (2) – अष्टापद (पुं-नपुं), शारिफल (पुं-नपुं)
समाहूयकृतद्यूतम्. (2) – प्राणिवृत्त (नपुं), समाह्वय (पुं)
2.10.46.1 – अष्टापदं शारिफलं प्राणिवृत्तं समाह्वयः

2.10.46.2 – उक्ता भूरिप्रयोगत्वादेकस्मिन्येऽत्र यौगिकाः

2.10.46.3 – ताद्धर्म्यादन्यतो वृत्तावूह्या लिङ्गान्तरेऽपि ते

2.10.47.1 – इत्यमरसिंहकृतौ नामलिङ्गानुशासने

2.10.47.2 – द्वितीयकाण्डो भूम्यादिः साङ्ग एव समर्थितः

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